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चूरू की ओपीजेएस (OPJS) यूनिवर्सिटी और राजस्थान फार्मेसी काउंसिल के बीच चल रहा यह विवाद राजस्थान के शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़े फर्जीवाड़े का संकेत

चूरू की ओपीजेएस (OPJS) यूनिवर्सिटी और राजस्थान फार्मेसी काउंसिल के बीच चल रहा यह विवाद राजस्थान के शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़े फर्जीवाड़े का संकेत 

विवाद का मुख्य केंद्र : फर्जी डिग्री और पंजीकरण

राजस्थान फार्मेसी काउंसिल ने हाल ही में 133 से अधिक अभ्यर्थियों का पंजीकरण (Registration) किया था। आरोप है कि ये पंजीकरण ओपीजेएस यूनिवर्सिटी, सादुलपुर की डिग्री और मार्कशीट के आधार पर किए गए।

उधर ओपीजेएस यूनिवर्सिटी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जिन वर्षों की डिग्रियां काउंसिल में जमा की गई हैं, उन वर्षों में यूनिवर्सिटी में संबंधित कोर्स के लिए न तो कोई एडमिशन हुए थे और न ही कोई परीक्षाएं आयोजित की गई थीं।

फर्जी आईडी और पासवर्ड का हुआ खेल ! : जांच में यह बात सामने आई है कि काउंसिल के कुछ पदाधिकारियों या साठगांठ करने वाले व्यक्तियों ने यूनिवर्सिटी के नाम से फर्जी ईमेल आईडी और पासवर्ड तैयार किए। इनके जरिए पोर्टल पर खुद ही दस्तावेजों का “सत्यापन” (Verification) दिखा दिया गया, जिसके आधार पर पंजीकरण जारी हो गए।

इस गंभीर मामले को देखते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों ने कड़े कदम उठाए हैं:

नए एडमिशन पर रोक : राजस्थान सरकार ने ओपीजेएस यूनिवर्सिटी में सत्र 2024-25 के लिए फार्मेसी सहित अन्य नए एडमिशन पर रोक लगा दी है।

रजिस्ट्रार पर गाज : राजस्थान फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार नरेंद्र नगर को उनके पद से हटा दिया गया है। उन पर आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान इन संदिग्ध पंजीकरणों की प्रक्रिया पूरी हुई।

जांच में देरी : काउंसिल के अध्यक्ष महावीर सोगानी ने स्वीकार किया है कि मामला गंभीर है और इस पर विचार के लिए बैठक बुलाई गई है। हालांकि, छुट्टियों और प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण जांच की गति धीमी रही है, जिससे उनकी भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

यूनिवर्सिटी की मांग : फॉरेंसिक ऑडिट

ओपीजेएस यूनिवर्सिटी ने इस मामले में खुद को पाक-साफ बताते हुए पुलिस प्रशासन से फाइनेंशियल फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की है। यूनिवर्सिटी का तर्क है कि :

काउंसिल के सदस्यों, बिचौलियों और अभ्यर्थियों के बीच हुए वित्तीय लेन-देन की जांच होनी चाहिए।

उन तकनीकी माध्यमों की जांच हो जिनसे फर्जी आईडी बनाकर सत्यापन का खेल खेला गया।

एफआईआर और नामजद आरोपी

यूनिवर्सिटी के फर्जी पोर्टल, ईमेल आईडी बनाने और मिलीभगत के मामले में दर्ज एफआईआर में मुख्य रूप से निम्नलिखित पक्षों और व्यक्तियों की भूमिका की जांच की जा रही है।

काउंसिल के तकनीकी कर्मचारी : एफआईआर में काउंसिल के आईटी विभाग से जुड़े कुछ अज्ञात और संविदा कर्मियों को नामजद किया गया है। आरोप है कि इन्होंने ही बाहरी लोगों के साथ मिलकर फर्जी ‘आईडी और पासवर्ड’ जेनरेट किए थे ताकि काउंसिल के सिस्टम में बाहरी डेटा को वैध दिखाया जा सके।

अभ्यर्थी और बिचौलिए : उन अभ्यर्थियों को भी जांच के दायरे में लिया गया है जिन्होंने जानते हुए कि उन्होंने परीक्षा नहीं दी है, फर्जी मार्कशीट का उपयोग किया। इसके अलावा, जयपुर और चूरू के कुछ शिक्षा माफिया/कंसल्टेंट्स को संदिग्ध माना गया है जो यूनिवर्सिटी और काउंसिल के बीच सेतु का काम कर रहे थे।

यूनिवर्सिटी के पूर्व पदाधिकारी : हालांकि वर्तमान प्रशासन ने एफआईआर दर्ज कराई है, लेकिन जांच एजेंसी SOG (Special Operations Group) पूर्व में गिरफ्तार हुए जोगिंदर सिंह दलाल (यूनिवर्सिटी के मालिक) और पूर्व रजिस्ट्रार जितेंद्र यादव के नेटवर्क की भी फिर से जांच कर रही है ताकि नए फर्जीवाड़े के तार जोड़े जा सकें।

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