किशोरावस्था में सहमति की आयु 18 से 16 वर्ष करने के प्रभावों पर गहन मंथन
Narchi

जयपुर, 5 दिसम्बर 2025
नार्ची राजस्थान द्वारा पोक्सो एक्ट पर राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण CME सम्पन्न
किशोरावस्था में सहमति की आयु 18 से 16 वर्ष करने के प्रभावों पर गहन मंथन
राष्ट्रीय प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य संघ (NARCHI) की राजस्थान स्टेट ब्रांच द्वारा “पोक्सो एक्ट एवं सहमति की आयु” विषय पर राष्ट्रीय स्तर की उच्चस्तरीय CME एवं पैनल चर्चा राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।
कार्यक्रम का मुख्य विमर्श रहा—
“क्या सहमति की कानूनी आयु 18 से घटाकर 16 वर्ष करने से किशोरों की सुरक्षा प्रभावित होगी?”
मुख्य अतिथि प्रियंक कानूनगो का संबोधन – ‘पोक्सो सबसे सशक्त बाल-सुरक्षा कानून’
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री प्रियंक कानूनगो, सदस्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, रहे।
डॉ. वीणा आचार्य, चेयरपर्सन, नार्ची राजस्थान द्वारा स्वागत भाषण के पश्चात मुख्य अतिथि एवं अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया गया।

अपने संबोधन में श्री कानूनगो ने कहा कि पोक्सो एक्ट देश में बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया सबसे सशक्त और कठोर कानून है, इसलिए इसमें किसी भी परिवर्तन को अत्यंत संवेदनशील, वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही देखा जाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किशोरावस्था में जैविक व मानसिक परिवर्तन अत्यधिक तीव्र होते हैं, ऐसे में सहमति की आयु 18 से घटाकर 16 वर्ष करने से “परिपक्वता बनाम दुरुपयोग” का संतुलन और जटिल हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि –
कानून का उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।
पोक्सो एक लैंगिक भेदभाव रहित कानून है।
पर्सनल लॉ पर इसकी प्रधानता तथा बाल-विवाह की रोकथाम में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस अवसर पर डॉ. वीणा आचार्य द्वारा तैयार किए गए पोस्टर का विमोचन किया गया। श्री कानूनगो एवं अन्य अतिथियों ने NARCHI की इस पहल की सराहना की।
विशिष्ट अतिथियों के विचार – सहमति की आयु कम करने पर गंभीर चिंताएँ
विशिष्ट अतिथि के रूप में रूवा की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती लाड़ कुमारी जैन तथा डीआईजी पुलिस श्रीमती स्वेता धनकर उपस्थित रहीं।
कार्यक्रम की संयोजक एडवोकेट मूमल राजवी ने कहा कि सहमति की आयु में बदलाव का प्रभाव आपराधिक न्याय प्रणाली, किशोर न्याय कानून, लैंगिक समानता और सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं पर दूरगामी रूप से पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि—
“16 वर्ष की आयु में निर्णय क्षमता समान रूप से विकसित नहीं होती। ऐसे में शोषण, ब्लैकमेल, ऑनलाइन ग्रूमिंग और साइबर अपराधों का जोखिम अत्यधिक बढ़ सकता है।”
विशेषज्ञों की व्यापक पैनल चर्चा

पैनल में प्रमुख विशेषज्ञों के रूप में डॉ. वीणा आचार्य, डॉ. उषा शेखावत, डॉ. रंजुला जैन ने भाग लिया।
पैनलिस्ट के रूप में अधिवक्ता मूमल राजवी, श्रीमती लाड़ जैन, डॉ. बी.एल. सोनी, डॉ. लीला व्यास, डॉ. रानू पाटनी, डॉ. मधुलिका अग्रवाल, डॉ. पूनम यादव, डॉ. दीपाली, डॉ. अनीता गौतम तथा कनोरिया कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल रंजुला भी मंच पर रहीं।
मुख्य बिंदु जो उभरकर सामने आए—
1. सहमति और अपराध की रेखा धुंधली होने का खतरा
विशेषज्ञों ने कहा कि आयु घटाने से किशोर जोड़ों में सहमति एवं अपराध की रेखा अस्पष्ट हो जाएगी।
रिपोर्टिंग पैटर्न बदल सकता है, जिससे अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका और अधिक चुनौतीपूर्ण होगी।
2. ग्रामीण क्षेत्रों में दुरुपयोग की आशंका
डॉ. बजरंग सोनी ने ग्रामीण अनुभव साझा करते हुए कहा कि कम आयु की “कानूनी सहमति” का दुरुपयोग कर बाल-विवाह और जबरन संबंध वैध रूप में पेश किए जाने की संभावनाएँ बढ़ जाएंगी।
3. ‘बाल संरक्षण बनाम बाल अधिकार’ का संतुलन
विशेषज्ञों की राय रही कि 16–18 वर्ष आयु वर्ग सबसे अधिक संवेदनशील है।
कानून को सुरक्षा के रूप में रहना चाहिए, न कि किशोरों का अपराधीकरण करने वाला।
डिजिटल युग की नई चुनौतियाँ – डॉ. तरु छाया
नार्ची की सचिव डॉ. तरु छाया ने डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, रील्स, “डिजिटल हार्मोनल इन्फ्लुएंस” और ऑनलाइन प्रलोभन की बढ़ती चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि—
“आज का डिजिटल संसार किशोरों को पहले से कहीं अधिक तेजी से प्रभावित करता है, ऐसे में 16 वर्ष की आयु वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।”
मॉडरेटर डॉ. पूनम यादव ने कहा कि अश्लील सामग्री की आसान उपलब्धता से जोखिम और घातक रूप ले चुका है।
मनोवैज्ञानिक परिपक्वता पर विशेषज्ञ मत
डॉ. अनीता गौतम ने बताया कि
18 वर्ष से पहले मनोवैज्ञानिक परिपक्वता स्थिर नहीं होती।
किशोर निर्णय अत्यधिक भावुक होते हैं, तर्कप्रधान नहीं।
मस्तिष्क पूर्ण विकसित नहीं होने के कारण विशेषकर लड़कियाँ दबाव या भावनात्मक परिस्थितियों में सहमति देने को बाध्य हो सकती हैं, जिसका जीवनभर मानसिक बोझ झेलना पड़ता है।
डॉ. लीला व्यास, डॉ. रानू पाटनी, डॉ. दीपाली, डॉ. मधुलिका अग्रवाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि
“18 वर्ष से कम आयु में लड़कियों को कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है। गलत निर्णय उन्हें दीर्घकालिक आघात और स्वास्थ्य हानियों तक ले जा सकते हैं।”
शारीरिक स्वास्थ्य एवं माँ-बच्चे पर प्रभाव – डॉ. वीणा आचार्य
चेयरपर्सन NARCHI, जयपुर के प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वीणा आचार्य ने संभावित खतरों के बारे में जानकारी देते हुए कहा—
16 वर्ष की आयु में लड़कियों का शरीर पूर्ण विकसित नहीं होता।
कम आयु में यौन संबंध से जननांगों में अल्सर, संक्रमण एवं अन्य जटिलताएँ हो सकती हैं।
गर्भधारण होने पर माँ में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, समयपूर्व प्रसव, नवजात मृत्यु जैसे गंभीर जोखिम बढ़ जाते हैं।
HPV संक्रमण का खतरा अधिक होता है, जिससे जीवन में आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा कि—
“सहमति की आयु 18 वर्ष से कम करना वर्तमान सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और डिजिटल परिदृश्य में सुरक्षित नहीं माना जा सकता।”
सभी विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से 18 वर्ष की आयु को बनाए रखने का समर्थन किया।
एक राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता
सभी प्रतिभागियों और विशेषज्ञों की राय में—
“पोक्सो कानून की भावना को कमजोर किए बिना, किशोरों की वास्तविक परिस्थितियों और न्यायिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए विस्तृत राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सोनल गौड़ ने किया तथा
डॉ. मधुलिका अग्रवाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
Presented Dr Dinesh Mathur Mo 9829061176



