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Imleacon 2026 : चिकित्सा और कानून के संगम पर जयपुर में मंथन; डॉक्टर-मरीज के बीच बढ़ते ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ पर चर्चा

Imleacon 2026 : चिकित्सा और कानून के संगम पर जयपुर में मंथन; डॉक्टर-मरीज के बीच बढ़ते ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ पर चर्चा

जयपुर। गुलाबी नगरी के जे.एम.ए. (जयपुर मेडिकल एसोसिएशन) हॉल में चिकित्सा और कानूनी बारीकियों पर केंद्रित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ‘Imleacon’ का भव्य आयोजन किया गया। इस सेमिनार का मुख्य उद्देश्य वर्तमान समय में चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ती कानूनी जटिलताओं (Medico-legal issues) और डॉक्टर-मरीज के बीच विश्वास के रिश्ते को पुनर्जीवित करना था।

कानूनी सावधानियाँ और पारदर्शिता

सेमिनार की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अतुल भार्गव और सचिव डॉ. अनुराग तोमर के नेतृत्व में देश भर से आए विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आज के दौर में हॉस्पिटल्स और क्लीनिक्स को किन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है। विशेषज्ञों ने बताया कि:

दस्तावेजीकरण (Documentation) : उपचार के दौरान हर छोटी-बड़ी प्रक्रिया का लिखित रिकॉर्ड रखना डॉक्टर की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

पारदर्शिता : बीमारी के निदान, इलाज के संभावित परिणामों और खर्चों के बारे में मरीज के परिजनों को शुरुआत में ही स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।

आक्रोश और सुरक्षा : जब इलाज के दौरान हो जाए मृत्यु

सेमिनार में एक गंभीर विषय पर चर्चा हुई कि अक्सर जांच या उपचार के दौरान मरीज की मृत्यु होने पर परिजन आक्रोशित होकर अस्पताल और डॉक्टरों पर हमला या आरोप लगाते हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए ‘इन्फॉर्म्ड कंसेंट’ (Informed Consent) यानी सूचित सहमति सबसे प्रभावी हथियार है। मरीज के जोखिम की जानकारी पहले ही लिखित में देना और संकट के समय सहानुभूति पूर्ण संवाद बनाए रखना हिंसा की घटनाओं को कम कर सकता है।

विश्वास का रिश्ता और पेशेंट काउंसलिंग

वक्ताओं ने कहा कि डॉक्टर और मरीज के बीच ‘विश्वास’ ही चिकित्सा का आधार है। यदि डॉक्टर उपचार की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता रखते हैं, तो कानूनी विवादों की संभावना स्वतः कम हो जाती है। मरीज के हितों की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और उन्हें उपचार की सीमाओं से अवगत कराना आज के समय की मांग है।

देशभर से आए दिग्गज चिकित्सकों ने मेडिको-लीगल पहलुओं पर अपने अनुभव साझा किए।

डॉ रजनीश कुमार शर्मा फैकल्टी IMLEACON 2026

“पारदर्शिता ही बचाव है” के मंत्र पर सभी विशेषज्ञों ने सहमति जताई।

भारत में चिकित्सा पद्धति और उससे संबंधित कानूनी नियमों को लेकर स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है। भारतीय कानून के अनुसार, कोई भी चिकित्सक केवल उसी पद्धति में अभ्यास (Practice) कर सकता है जिसमें उसने डिग्री हासिल की है और संबंधित काउंसिल में उसका पंजीकरण (Registration) है। 

प्रस्तुति है एक संक्षिप्त और कानून-संगत रिपोर्ट :

भारत में चिकित्सा पद्धति और पंजीकरण संबंधी कानूनी रिपोर्ट

भारत में ‘क्रॉस-पैथी’ (एक पद्धति की पढ़ाई कर दूसरी पद्धति में इलाज करना) को लेकर उच्चतम न्यायालय और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर कड़े निर्देश जारी किए हैं।

1. एलोपैथी (आधुनिक चिकित्सा)

पंजीकरण: केवल वे चिकित्सक जिन्होंने NMC (National Medical Commission), जो पहले MCI था, से मान्यता प्राप्त संस्थान से MBBS की डिग्री ली है, वही एलोपैथी दवाओं और सर्जरी का अभ्यास कर सकते हैं।

कानून : NMC अधिनियम, 2019 के अनुसार, बिना उचित पंजीकरण के एलोपैथी प्रैक्टिस करना ‘झोलाछाप’ श्रेणी में आता है और इसके लिए दंड का प्रावधान है।

2. आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, और होम्योपैथी)

पंजीकरण : आयुष चिकित्सकों का पंजीकरण NCISM (National Commission for Indian System of Medicine) या NCH (National Commission for Homoeopathy) के तहत होता है।

होम्योपैथी प्रैक्टिस : एक होम्योपैथी डॉक्टर केवल होम्योपैथी दवाओं से ही उपचार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि वे एलोपैथी दवाएं नहीं लिख सकते।

आयुर्वेद (BAMS): कुछ राज्यों में (जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा) विशिष्ट नियमों के तहत BAMS डॉक्टरों को सीमित मात्रा में एलोपैथी दवाओं के उपयोग की अनुमति है, लेकिन यह केवल राज्य सरकार के गजट नोटिफिकेशन पर निर्भर करता है। राष्ट्रीय स्तर पर, मूल सिद्धांत अपनी ही पद्धति में अभ्यास करने का है।

3. क्रॉस-पैथी और कानूनी परिणाम

यदि कोई डॉक्टर अपनी पंजीकृत पद्धति को छोड़कर दूसरी पद्धति में इलाज करता है, तो उसे निम्नलिखित कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:

लापरवाही का मामला (Medical Negligence) : यदि गलत पद्धति से इलाज के दौरान मरीज को नुकसान होता है, तो उसे ‘मेडिकल नेग्लिजेंस’ माना जाता है।

पंजीकरण रद्द होना : संबंधित काउंसिल उस डॉक्टर का लाइसेंस रद्द कर सकती है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम : मरीज का परिवार मुआवजे के लिए उपभोक्ता फोरम में जा सकता है।

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