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एंडोस्कोपी के क्षेत्र में नई क्रांति : Endocon 2025 सम्मेलन में विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव और नवाचार

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एंडोस्कोपी के क्षेत्र में नई क्रांति : Endocon 2025 सम्मेलन में विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव और नवाचार

 

जयपुर, होटल क्लार्क आमेर — Endocon 2025 के भव्य सिल्वर जुबली सम्मेलन में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और एंडोस्कोपी के क्षेत्र में हो रही अभूतपूर्व प्रगति को उजागर किया गया। देश-विदेश के प्रख्यात विशेषज्ञों ने अपनी प्रस्तुतियों और अनुभवों से यह स्पष्ट किया कि कैसे दूरबीन शल्य चिकित्सा (एंडोस्कोपी) रोग पहचान के सीमित दायरे से निकल कर अब प्रभावी उपचार का एक प्रमुख माध्यम बन गई है।

डॉ. सुभाष चंद्र कोरपे (पचन संस्था सर्जन एवं दूरबीन परीक्षक, कोरपे मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, अकोला, महाराष्ट्र) ने कहा,

>गैस्ट्रो सर्जरी में क्रांति: डॉ. कोरपे के अनुसार बीते 50 वर्षों में दूरबीन सर्जरी का अभूतपूर्व विकास

अकोला, महाराष्ट्र से डॉ. सुभाष चंद्र कोरपे, जो कोरपे मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में एक जाने-माने पाचन संस्था सर्जन और दूरबीन परीक्षक हैं, ने गैस्ट्रो सर्जरी के क्षेत्र में पिछले 50 वर्षों में आए अमूलचूल परिवर्तनों पर प्रकाश डाला है। डॉ. कोरपे के अनुसार, मेडिकल साइंस की तरक्की ने इस क्षेत्र को पूरी तरह से बदल दिया है, खासकर दूरबीन सर्जरी (लैप्रोस्कोपिक सर्जरी) के संबंध में।

उन्होंने बताया कि लगभग 50 साल पहले, दूरबीन शास्त्र (एंडोस्कोपी) का उपयोग मुख्य रूप से रोगों के निदान तक ही सीमित था। यह सिर्फ शरीर के अंदरूनी हिस्सों को देखने और समस्याओं की पहचान करने का एक जरिया था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में हुई वैज्ञानिक प्रगति ने इस तस्वीर को पूरी तरह से बदल दिया है।

आज की तारीख में, दूरबीन शास्त्र केवल निदान का साधन नहीं रहा, बल्कि यह रोगों के इलाज का एक सर्वोत्तम और अत्यधिक प्रभावी साधन साबित हो रहा है। डॉ. कोरपे जोर देते हैं कि हम सभी मेडिकल साइंस की इस शानदार तरक्की के चश्मदीद गवाह हैं। पहले जहां बड़े चीरे लगाकर सर्जरी की जाती थी, वहीं अब न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों (minimally invasive techniques) का उपयोग कर जटिल से जटिल पाचन संबंधी बीमारियों का सफल इलाज किया जा रहा है। इससे मरीजों को कम दर्द, तेजी से रिकवरी और अस्पताल में कम समय तक रुकना पड़ता है।

डॉ. कोरपे ने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी दूरबीन शास्त्र आरोग्य के क्षेत्र में अत्यंत अहम भूमिका निभाएगा। यह न केवल निदान और उपचार को और अधिक सटीक बनाएगा, बल्कि सर्जरी को और भी सुरक्षित और सुलभ बनाने में मदद करेगा। यह परिवर्तन मरीजों के लिए वरदान साबित हुआ है और आने वाले समय में चिकित्सा विज्ञान में नए मील के पत्थर स्थापित करेगा।

सम्मेलन में गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली से आए सुप्रसिद्ध गैस्ट्रो विशेषज्ञ डॉ. पीयूष रंजन ने बताया कि पित्त की थैली, अग्न्याशय (पेनक्रियाज) और भोजन नली से संबंधित जटिल रोगों का इलाज अब दूरबीन के माध्यम से ही संभव है।

> “कलोंजियोस्कोपी से पथरी को बिना चीरे के तोड़ा और निकाला जा सकता है, स्टंट डालकर ब्लॉकेज हटाया जा सकता है, और प्रारंभिक अवस्था में ट्यूमर की पहचान NBI तकनीक द्वारा हो रही है।”

यूके की पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी और मायो क्लीनिक से जुड़े वरिष्ठ एंडोस्कोपिस्ट प्रो. डॉ. प्रदीप भंडारी ने भारत में एंडोस्कोपी की अपार संभावनाओं की सराहना की।

> “यूके में जहां ओसोफेगस कैंसर की प्रारंभिक जांच के लिए नेशनल स्क्रीनिंग प्रोग्राम हैं, वहीं भारत में ऐसी व्यवस्था का अभाव है। इसके बावजूद भारतीय एंडोस्कोपिस्ट तकनीकी रूप से अत्यंत दक्ष हैं और कई बार यूके के विशेषज्ञों से भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह सम्मेलन वैश्विक सहयोग का उत्कृष्ट अवसर साबित हुआ।”

सम्मेलन के चेयरमैन डॉ. एस. एस. शर्मा ने कहा,

> “एंडोस्कोपी की नवीनतम तकनीकों पर आधारित यह सम्मेलन अत्यंत सफल रहा। मोटापे का बिना ऑपरेशन इलाज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा छोटी आँत, अमाशय व बड़ी आँत में कैंसर की प्रारंभिक पहचान, और बिना चीरे के ट्यूमर निकालने जैसी आधुनिक विधियों पर विस्तार से चर्चा हुई।”

उन्होंने यह भी बताया कि एंडोस्कोपी को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए नवोदित चिकित्सकों को एनिमल मॉडल्स पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। ASGE (American Society for Gastrointestinal Endoscopy) के सहयोग से पीजी कोर्स का भी आयोजन हुआ, जिसमें प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

सोसायटी ऑफ गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल एंडोस्कोपी ऑफ इंडिया की ओर से शुरू हुई 3 दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस में पहले दिन देश-विदेश के विशेषज्ञों ने एंडोस्कोपी के जटिल पहलुओं पर चर्चा की। ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन और सीनियर गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. एसएस शर्मा ने बताया कि इसमें कई देशों से 1500 से अधिक विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. अभिनव शर्मा और डॉ. सुधीर महर्षि ने बताया कि एंडोस्कोपी के जरिए आंत के सिकुड़े हिस्से को बैलून से फैलाकर खोला जा सकता है।

40 परसेंट भारतीयों को पेट में होती है अल्सर की बीमारी ;

स्मोकिंग, अल्कोहल और मसाले खाने से अल्सर होते हैं। किसी भी स्टडी में यह साबित नहीं हुई है। खाना पेट की हर बीमारी की वजह है। अल्सर होने की वजह एक बैक्टीरिया है। यूएस में लोग चम्मच से खाना खाते हैं। वहां 1 प्रतिशत लोगों में अल्सर होते हैं। इंडिया में 40 प्रतिशत लोगों के पेट में अल्सर होते हैं। यह एंटीबॉयोटिक से ठीक किया जा सकता है। यह बात एंडोस्कोपी के पॉयनियर डॉ. फिलिप ऑगस्टाइन ने कही। अब एंडोस्कोपी में एआई आ चुका है, लेकिन यह डॉक्टर की जगह नहीं ले पाएगा।

कोलोन कैंसर से बचाव के लिए 50 की उम्र में करवाएं कोलोनोस्कोपी; कोलोन कैंसर से बचाव के लिए 50 साल की उम्र होने पर एक बार कोलोनोस्कोपी जरूर करवाएं। यह टेस्ट करवाने के बाद दस साल तक यह कैंसर होने की रिस्क खत्म हो जाती है। यह टेस्ट बिल्कुल नॉर्मल है। 10 साल बाद इसे रिपीट करवाएं। यह जानकारी मेदांता हॉस्पिटल के गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. रणधीर सूद ने दी। उन्होंने बताया कि चाइना, जापान सहित कई देशों में पचास की उम्र में यह टेस्ट स्क्रीनिंग की तरह किया जाता है। अपना बीएमआई 24 से नीचे रखें।

कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर्स ने कहा- लिवर इंजरी को ठीक करेगी प्लाज्मा एक्सचेंज थैरेपी

हैपेटाइटिस-बी अभी एक स्टिंगमा बना हुआ है। जबकि इसे वैक्सीनेशन से कंट्रोल किया जा सकता है। यह वायरस शरीर में 50 साल तक रहता है। मां से बच्चे में ट्रांसफर हो रहा है। सिंगल पिल से यह वायरस इनएक्टिव रहता है। वहीं न्यू बोर्न बेबी और किसी भी उम्र में इसका वैक्सीन लगाकर इस बीमारी को खत्म किया जा सकता है। 40 परसेंट लोगों में हैपेटाइटिस-बी लिवर कैंसर की एक बड़ी वजह है। पद्मभूषण गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. शिव सरीन ने कहा कि जिन लोगों का सीवियर पीलिया या अल्कोहल लेने से लिवर खराब हो रहा है, उनका प्लाज्मा एक्सचेंज थैरेपी से जिंदगी बचाई जा सकती है।

एआई एंडोस्कोपी का एक्यूरेसी लेवल 95 परसेंट; अब एआई एंडोस्कोपी से कैंसर डायग्नोस करना आसान हो गया है। इससे आंत के ऊपरी हिस्से, बड़ी आंत में बनने वाले कैंसर के फॉलिफ डायग्नोस हो जाते हैं। जल्दी ऑपरेशन करके फॉलिफ को निकाल दिया जाता है। इससे कैंसर का खतरा खत्म हो जाता है।

एसएमएस हॉस्पिटल के गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर महर्षि ने कहा, एआई एंडोस्कॉपी का एक्यूरेसी लेवल 95 परसेंट से ज्यादा है। जबकि पहले छोटे लीजन कम डायग्नोस हो पाते थे। एक्यूरेसी लेवल 50 परसेंट था। एंडोस्कोपी से फॉलिप को निकाल देंगे। इससे कैंसर की पहचान जल्दी होगी।

नई तकनीक : मैग्नेट थैरेपी से बिना सर्जरी के जुड़ेगी पित्त की नली

कई कारणों से पित्त की नली में इंजरी के 3 प्रतिशत मामले सामने आते हैं। अब तक इन्हें ओपन सर्जरी कर वापस जोड़ा जाता रहा, लेकिन अब पेट में एंडोस्कोपी से दो चुंबक पहुंचा कर उन्हें आपस में जोड़ दिया जाता है। यह जानकारी सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल एंडोस्कोपी ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस एंडोकॉन-2025 में गुजरात के डॉ. संजय राजपूत ने दी। उन्होंने बताया कि नई तकनीक ‘मैग्नेटिक कम्प्रेशन एनास्टोमोसिस’ यानी मैग्नेट थैरेपी से बंद पित्त नली को बिना चीरा लगाए जोड़ सकते हैं। एक छोटे मैग्नेट को एंडोस्कोपी के जरिये मुंह से आंत में डाला जाता है, जबकि दूसरा त्वचा के रास्ते पित्त नली के कटे हिस्से तक पहुंचाया जाता है। दोनों मैग्नेट अवरुद्ध स्थान पर एक-दूसरे की ओर खिंचाव बनाते हैं और कुछ दिनों में बीच की दीवार को गलाकर नया रास्ता बना देते हैं।

 एंडोस्कोपिक प्रोसीजर सिखाया

कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन डॉ. एस.एस. शर्मा ने बताया कि एनिमल सिम्युलेटर पर युवा डॉक्टर्स को एंडोस्कोपिक प्रोसीजर करना सिखाया। डॉ. रूपेश पोखरणा ने बताया कि विशेषज्ञों ने एडवांस एंडोस्कोपिक तकनीक के बारे में बताया। डॉ. बी.सी. शर्मा ने बीजे वकील ओरेशन दिया, डॉ. गौरदास चौधरी ने इंटरवेंशनल एंडोस्कोपी, डॉ. शिव सरीन ने भोजन नली की बीमारियों की पहचान पर बात की। डॉ. अभिनव शर्मा व डॉ. सुधीर महर्षि ने भी विचार व्यक्त किए।

 एंडोस्कोपी के भविष्य पर सह-आयोजन चेयरमैन और प्रमुख गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स के विचार

जयपुर में आयोजित एंडोकॉन 2025 सम्मेलन, जो गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और एंडोस्कोपी के क्षेत्र में नवीनतम नवाचारों पर केंद्रित था, को इसके सह-आयोजन चेयरमैन और प्रमुख गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स की दूरदर्शिता और नेतृत्व ने और भी समृद्ध बनाया। डॉ. रूपेश पोखरना, डॉ. दिनेश अग्रवाल, डॉ. अभिनव शर्मा, और डॉ. सुधीर महर्षि ने एंडोस्कोपी के बदलते परिदृश्य और भविष्य की संभावनाओं पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए।

डॉ. रूपेश पोखरना : उन्नत एंडोस्कोपिक तकनीकों का महत्व

सम्मेलन के सह-आयोजन चेयरमैन डॉ. रूपेश पोखरना ने एंडोस्कोपी के क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि एंडोकॉन 2025 में विशेषज्ञों ने उन्नत एंडोस्कोपिक तकनीकों के बारे में विस्तार से बताया, जो अब न केवल निदान बल्कि जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं के उपचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। डॉ. पोखरना के अनुसार, यह सम्मेलन युवा चिकित्सकों को नवीनतम प्रक्रियाओं से परिचित कराने और उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने में सहायक रहा, जिससे वे भविष्य में इन तकनीकों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें।

डॉ. दिनेश अग्रवाल : एंडोस्कोपी में बढ़ता नवाचार और रोगी देखभाल

एक और सह-आयोजन चेयरमैन, डॉ. दिनेश अग्रवाल, ने एंडोस्कोपी के क्षेत्र में बढ़ते नवाचारों और रोगी देखभाल पर उनके प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कैसे एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं अब मरीजों के लिए कम आक्रामक, अधिक सुरक्षित और त्वरित रिकवरी वाली साबित हो रही हैं। डॉ. अग्रवाल ने सम्मेलन में प्रस्तुत की गई नई तकनीकों की सराहना की, जो जटिल सर्जरी की आवश्यकता को कम कर रही हैं और रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर रही हैं। उनका मानना है कि भविष्य में एंडोस्कोपी रोगी देखभाल के केंद्र में होगी।

डॉ. अभिनव शर्मा : आंत संबंधी समस्याओं का एंडोस्कोपिक समाधान

ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. अभिनव शर्मा ने एंडोस्कोपी के माध्यम से आंत संबंधी समस्याओं के उपचार में हो रही प्रगति पर विशेष ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि अब एंडोस्कोपी के जरिए आंत के सिकुड़े हिस्से को बैलून से फैलाकर खोला जा सकता है, जो पहले सर्जरी के बिना संभव नहीं था। यह तकनीक उन मरीजों के लिए एक वरदान है जो आंतों में रुकावट या संकुचन से पीड़ित हैं। डॉ. शर्मा ने यह भी बताया कि सम्मेलन में चर्चा की गई नई प्रक्रियाएं मरीजों को कम असुविधा के साथ प्रभावी उपचार प्रदान कर रही हैं, जिससे वे तेजी से सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।

डॉ. सुधीर महर्षि : एआई एंडोस्कोपी से कैंसर का प्रारंभिक निदान

ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. सुधीर महर्षि ने एंडोस्कोपी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के एकीकरण को एंडोकॉन 2025 का एक महत्वपूर्ण बिंदु बताया। उन्होंने कहा कि एआई एंडोस्कोपी से कैंसर का निदान करना अब बहुत आसान हो गया है, खासकर आंत के ऊपरी हिस्से और बड़ी आंत में बनने वाले कैंसर के फॉलिफ (पॉलीप) का। डॉ. महर्षि के अनुसार, एआई की मदद से ये छोटे घाव भी आसानी से पहचाने जा सकते हैं, जिन्हें पहले डायग्नोस करना मुश्किल होता था। उन्होंने बताया कि एआई एंडोस्कोपी का एक्यूरेसी लेवल 95 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि पहले यह केवल 50 प्रतिशत के आसपास था। इस प्रारंभिक पहचान से फॉलिफ को जल्दी निकालकर कैंसर के खतरे को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। यह तकनीक कैंसर के खिलाफ लड़ाई में एक गेम चेंजर साबित हो रही है।

यह सम्मेलन न केवल चिकित्सा क्षेत्र की वैज्ञानिक उपलब्धियों का परिचायक रहा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत में मेडिकल साइंस किस तेज़ी से उन्नति कर रही है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की प्रतिभा और समर्पण के बल पर अब गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों का भी कम समय में, कम कष्ट के साथ और कम खर्च में इलाज संभव हो गया है।

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