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भारत में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर बीमारी का खतरा बढ़ा, 

भारत में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर बीमारी का खतरा बढ़ा, 

लाइफस्टाइल और आहार में सुधार किया जाना आवश्यक 

66% मौतों के पीछे नॉन कम्युनिकेबल डिजीज

नई दिल्ली।

भारत में नॉन- अल्कोहलिक फैटी लिवर (एनएएफएलडी) बीमारी के बढ़ते खतरे को देखते हुए इसे भी नॉन कम्युनिकेबल डिजीज (एनसीडी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

आंकड़े बताते है देश में 66% मौतें एनसीडी के कारण होती है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या पर चिंता जताते हए कहा कि युवाओं में इसका खतरा ज्यादा बढ़ गया है। देश में हर दस में से तीन लोग इस समस्या से पीड़ित देखे जा रहे हैं।

एनएएफएलडी के लिए दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण मॉड्यूल जारी करते हुए अपूर्व चंद्रा ने कहा, सभी लोगों को इस रोग के बारे में जानना और इससे बचाव की जागरूकता जरूरी है। एनएएफएलडी और कई प्रकार की मेटाबॉलिक बीमारियों, जैसे मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों के बीच संबंध पाया गया है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की विशेष कार्य अधिकारी पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि एनएएफएलडी के दिशा-निर्देशों को अमल में लाना जरूरी है , ताकि बीमारी का जल्द पता लगाया जा सके।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार तंबाकू सेवन, धूम्रपान, गलत खान-पान, शारीरिक गतिविधियों में कमी और वायु प्रदूषण के कारण नॉन कम्युनिकेबल डिजीज बढ़ रही हैं।

ये फैटी लिवर रोग के खतरे को भी बढ़ा रही हैं। चिंताजनक यह है कि खतरा उन लोगों में भी बढ़ता देखा जा रहा है, जो शराब नहीं पीते।

अल्कोहलिक फैटी लिवर से पीड़ित लोगों की निरंतर देखभाल और इलाज महत्त्वपूर्ण है। इस रोग के बढ़ते जोखिम को कम करने के लिए लाइफस्टाइल और आहार में सुधार किया जाना चाहिए।

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